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Article |
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माया कब प्रभाव नहीं करती ? (प्रभु के सानिध्य में होने पर माया प्रभाव नहीं करती)
भक्ति करके जीव प्रभु तक पहुँच सकता है । जीव एक रेत के कण की तरह होता है जो प्रभु के श्रीकमलचरणों के समीप पड़ा होता है । फिर माया की हवा वेग से बहती है और उसे उठाकर संसार में डाल देती है । पर जिनको प्रभु आश्रय देते हैं उन जीवों को प्रभु अपने श्रीकमलचरणों के नीचे रख लेते हैं, तब माया उन्हें प्रभावित नहीं कर पाती । कुछ बिरले भक्तों को प्रभु अपने श्रीकमलचरणों की छत्रछाया प्रदान करते हैं फिर उन पर माया नहीं व्याप्ति । माया से बचने का एकमात्र उपाय है कि प्रभु के सानिध्य में प्रभु के श्रीकमलचरणों के नीचे रहना । प्रभु के समक्ष माया निष्क्रिय हो जाती है और जीव माया के प्रभाव से बच जाता है अन्यथा माया के प्रभाव से कोई भी नहीं बच पाया है ।
इसलिए जीव को चाहिए कि माया के प्रभाव से बचना है तो प्रभु के श्रीकमलचरणों के सानिध्य में रहे जिससे माया उस जीव के जीवन में निष्क्रिय हो जाए ।
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किसको जीवन से नहीं जाने दें ? (प्रभु को जीवन से नहीं जाने दें)
एक व्यक्ति के पास फैक्ट्री थी जो घाटे के कारण नीलाम होकर चली गई । उसके पास धन था जो नुकसान होकर चला गया । उसका परिवार था जिसने विपदा में उसे अलग कर दिया और अपने द्वार उसके लिए सदा के लिए बंद कर लिए । उस व्यक्ति के पास प्रभु भी थे जिनको उसने जाने नहीं दिया और प्रभु के श्रीकमलचरणों में पड़कर प्रभु को अपने जीवन में रोक लिया । यह उसकी सबसे बड़ी जीत हो गई और वह जीवन की बाजी हारा नहीं बल्कि जीवन की बाजी जीत गया । प्रभु का सानिध्य नहीं छोड़ने के कारण वह अंत में संसार सागर से तर गया, आवागमन से छूट गया और प्रभु के धाम पहुँच गया । इससे सिद्धांत निकलता है कि प्रयास के बाद भी सब कुछ चला जाए तो जाने दें और दुःख नहीं करें पर प्रभु को अपने संग में रखें और उन्हें कभी जीवन से जाने नहीं दें । प्रभु हमारे जीवन में रहेंगे तो हमारी जीत पक्की है । श्री महाभारतजी में पांडव इसके जीवंत उदाहरण हैं ।
इसलिए जीवन में प्रभु के सानिध्य को कभी नहीं छोड़ना चाहिए । अन्य कुछ भी छूट जाए उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए पर प्रभु सानिध्य को भूलकर भी कभी नहीं छोड़ना चाहिए ।
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किससे अपना संबंध रखें ? (प्रभु से अपना संबंध रखें)
भक्ति करने वालों के लिए एक रूप से प्रभु सिर्फ उनके होते हैं । वैसे प्रभु इतने विराट और विशाल हैं और कोटि-कोटि ब्रह्मांडों का संचालन करते हैं फिर भी अपने एक-एक भक्त के लिए एक-एक रूप में प्रभु उपलब्ध रहते हैं । प्रभु व्यक्तिगत रूप से अकेले सिर्फ और सिर्फ हमारे लिए उपलब्ध होते हैं । हम प्रभु का सानिध्य प्राप्त कर सकते हैं । प्रभु के समक्ष बैठकर अपनी बात प्रभु के सामने रख सकते हैं । प्रभु से बातें कर सकते हैं । प्रभु का लाड़ और दुलार कर सकते हैं । प्रभु से अपनी हर समस्या निवेदन कर सकते हैं । प्रभु से विनोद कर सकते हैं और प्रभु से रूठ भी सकते हैं । प्रभु की मनुहार कर सकते हैं और प्रभु के साथ समय व्यतीत कर सकते हैं । यह सिर्फ और सिर्फ भक्ति का सामर्थ्य है कि वह ऐसा करवा सकती है ।
इसलिए दुनियादारी करते हुए संसार से संबंध रखने के बजाए वही ऊर्जा प्रभु से संबंध रखने में लगानी चाहिए । यही मानव जीवन की सच्ची उपलब्धि है जिससे हमारा कल्याण सुनिश्चित होता है ।
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प्रभु हमसे क्या चाहते हैं ? (प्रभु हमारा मन और हमारी बुद्धि चाहते हैं)
प्रभु हमसे हमारे मन और हमारी बुद्धि की मांग करते हैं क्योंकि हम अंश हैं और प्रभु हमारे अंशी हैं । इसलिए हमारी हर चीज पर प्रभु का अधिकार है । प्रभु ने हमें अपने लिए ही बनाया है क्योंकि प्रभु एक से अनेक होना चाहते थे । हम प्रभु के हैं इसलिए प्रभु हमसे कुछ भी मांग सकते हैं । पर प्रभु हमसे न तन मांगते हैं, न धन मांगते हैं, प्रभु तो मात्र हमारा मन और हमारी बुद्धि मांगते हैं । संसार का व्यवहार करते हुए भी हम अपना मन और अपनी बुद्धि कितनी आसानी से प्रभु को दे सकते हैं पर हम ऐसा नहीं करते । प्रभु चाहते हैं कि हम अपना मन और अपनी बुद्धि प्रभु को समर्पित करें पर हमारा दुर्भाग्य देखें कि हम अपना मन पत्नी, पुत्र, पौत्र को देकर रखते हैं और अपनी बुद्धि धन कमाने के लिए उपयोग करते हैं । इस प्रकार दोनों ही हम प्रभु को नहीं देते ।
जीव को चाहिए कि अपना मन और अपनी बुद्धि प्रभु को अर्पण करे जिससे प्रभु प्रसन्न हों और हमारा कल्याण हो सके ।
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कौन-सी कमाई गौण है ? (धन की कमाई गौण है)
पूरा जीवन भी अगर हम धन कमाने में लगा देते हैं और बड़ी फैक्ट्रियां और व्यवसाय खड़ा कर लेते हैं और अरबों खरबों की राशि जमा कर लेते हैं तो भी धन की जीवनभर की कमाई व्यर्थ है । क्योंकि वह हमें एक अतिरिक्त श्वास भी नहीं दिला सकती । जरा सोचें कि पूरे जीवन में अर्जित धन अगर हमें एक अतिरिक्त श्वास नहीं दिला सकता और हमारा परलोक नहीं सुधर सकता तो वह कितना गौण है । जबकि भक्ति की कमाई हमारा कल्याण और उद्धार करती है और हमें जन्म-मृत्यु के चक्र से सदैव के लिए मुक्त कर देती है । भक्ति हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों में सदा के लिए स्थान दिला देती है । भक्ति करने वाले को फिर चौरासी लाख योनियों में भ्रमण नहीं करना पड़ता और दोबारा संसार में नहीं आना पड़ता ।
इसलिए जीवन में जितना जीवन यापन के लिए जरूरी है उतना धन कमाकर बाकी ऊर्जा भक्तिरूपी धन कमाने में लगाना चाहिए । ऐसा करने पर ही हमारा मानव जन्म सफल होगा ।
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प्रभु के सामने कैसा बनना चाहिए ? (प्रभु के सामने अबोध बालक जैसा बनना चाहिए)
प्रभु के सामने एकदम नवजात अबोध बालक जैसा बन जाना चाहिए । नवजात बालक की अपनी कोई इच्छा नहीं होती इसलिए उसकी हर जरूरत की पूर्ति बिना मांगे ही उसकी माँ करती है । उस अबोध बालक को अपनी माँ से कुछ नहीं कहना पड़ता क्योंकि उसकी माँ स्वतः ही बिना कहे उसकी हर जरूरत की पूर्ति करती है । वैसे ही अगर हम प्रभु के समक्ष अबोध बालक जैसा बन जाते हैं और अपनी बुद्धि नहीं चलाते तो प्रभु भी हमारा पूरा ख्याल रखेंगे और हमारी हर जरूरत की पूर्ति बिना कहे ही करेंगे । प्रभु हमें हर विपदा से बचाएंगे और हमारी सदैव रक्षा करेंगे । प्रभु हमारा भरपूर हित करेंगे और कभी भी हमारा पतन नहीं होने देंगे, न ही कभी हमें पथभ्रष्ट होने देंगे । एक संसारी माँ से भी कोटि-कोटि गुना ज्यादा प्रभु हमारा ख्याल रखेंगे । जरूरत बस इतनी-सी है कि एक नवजात अबोध बालक की तरह प्रभु के सामने हम प्रस्तुत हो जाएं ।
जीवन में अगर हम एक नवजात अबोध बालक जितने मन से निर्मल होकर बिना किसी अभिलाषा के प्रभु के समक्ष प्रस्तुत हो जाए तो हमारा कल्याण सुनिश्चित है ।
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प्रभु की सेवा और पूजा कैसी हो ? (प्रभु की सेवा और पूजा प्रेम से भरी हो)
प्रभु की सेवा और पूजा अधिकतर लोग किसी डर के निवारण के लिए अथवा किसी आशा और कामना पूर्ति के लिए करते हैं । अधिकतर लोग ऐसा ही करते हैं पर कुछ बिरले होते हैं जो प्रभु प्रेम के कारण प्रभु की सेवा और पूजा करते हैं । वे निष्काम होते हैं और प्रभु की सेवा और पूजा में उनका कोई स्वार्थ जुड़ा हुआ नहीं होता । ऐसे बिरलों की पूजा और सेवा प्रभु सहर्ष स्वीकार करते हैं क्योंकि प्रभु को पता होता है कि उसके पीछे उनका कोई हेतु या स्वार्थ नहीं है । ऐसी सेवा और पूजा बड़ी लाभकारी होती है क्योंकि वह प्रभु को प्रसन्न करने की क्षमता रखती है । डर से निवृत्ति के लिए या कामना पूर्ति के लिए की गई प्रभु की सेवा और पूजा से उसका फल मिलता है यानी डर मिटता है और कामना की पूर्ति होती है । पर निष्काम सेवा और पूजा करने वाले को प्रभु का सानिध्य ही मिल जाता है । सभी शास्त्रों, संतों और भक्तों ने नि:स्वार्थ और निष्काम प्रेम से भरी प्रभु की पूजा और सेवा के लिए सदैव हमारा आह्वान किया है ।
इसलिए प्रभु की सेवा और पूजा नि:स्वार्थ और निष्काम होनी चाहिए और प्रेम से भरी होनी चाहिए तभी वह हमारा परम मंगल करती है ।
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भवसागर में फंसी नैया को कौन पार करता है ? (भवसागर में फंसी नैया को प्रभु पार करते हैं)
अगर हमारी नैया भवसागर में भयंकर भंवर में फंस जाए और बचने का कोई उपाय नहीं हो तो हमें क्या करना चाहिए । हमें प्रभु को पुकारना चाहिए और प्रभु की कृपा दृष्टि की आस करनी चाहिए । जैसे ही हमारे ऊपर प्रभु की कृपा दृष्टि पड़ती है वह भयंकर भंवर हमें पार होने के लिए रास्ता दे देता है । किसी भंवर की ताकत नहीं कि प्रभु के कृपा पात्र जीव को फंसाए । प्रभु की कृपा का इतना बड़ा बल होता है कि भवसागर को हम सहज ही पार कर सकते हैं । इसलिए जब हमें भवसागर पार करना हो तो हमें प्रभु का ही एकमात्र आश्रय लेना चाहिए । भवसागर को सुचारु रूप से पार करने का अन्य कोई उपाय नहीं है । भवसागर को पार करने की सफलता प्रभु की कृपा से ही संभव होती है । इसलिए जीवन में प्रभु की कृपा अर्जित करने का प्रयास करना चाहिए । प्रभु की कृपा अर्जित किया हुआ जीव भवसागर से डरेगा नहीं क्योंकि उसे पता है कि प्रभु की कृपा बड़ी सरलता से उसे भवसागर पार करा देगी ।
प्रभु की कृपा हमारे जीवन यापन के लिए भी जरूरी है और मृत्यु उपरांत भवसागर पार करने के लिए भी जरूरी है ।
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कर्म कैसे करें ? (प्रभु को मध्य में रखकर कर्म करें)
हमें हर कर्म प्रभु को मध्य में रखकर और प्रभु के श्रीकमलचरणों में उस कर्म को अर्पण करके करना चाहिए । प्रभु ने स्वयं अपने श्रीवचन में श्रीमद् भगवद् गीताजी में ऐसा करने के दो कारण बताएं हैं । पहला कारण कि जीव प्रभु का अंश है और दूसरा कारण जीव में जो कर्म करने की शक्ति है वह प्रभु की दी हुई है । हम प्रभु के अंश हैं और हमारी शक्ति प्रभु की दी हुई है । इसलिए प्रभु के बिना किया कर्म और श्रम व्यर्थ जाता है । अब हमें यह चिंतन करना चाहिए कि हमारे कितने कर्म हमने प्रभु को मध्य में रखकर किए हैं । कहीं ऐसा तो नहीं कि अधिकतर कर्म हमने प्रभु को मध्य में रखे बिना किए हैं । प्रभु को मध्य में रखकर और प्रभु के श्रीकमलचरणों में अर्पण करके किया गया कर्म हमें कर्मबंधन में नहीं बांधता और हम उसके कर्मफल से मुक्त हो जाते हैं । प्रभु को मध्य में रखकर किया कर्म सदैव सत्कर्म ही होगा । प्रभु हमारे जीवन के मध्य में रहेंगे तो हम किसी भी विपरीत कर्म करने से बचे रहेंगे ।
इसलिए जीवन में प्रभु को मध्य में रखकर कर्म करना ही श्रेष्ठ होता है और हमें ऐसा ही करना चाहिए ।
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पुण्य कर्म कैसे होंगे ? (प्रभु को जीवन के मध्य में रखने पर पुण्य कर्म होंगे)
जब हमारा जीवन प्रभु से विमुख होता है तो बुराइयां हमारे भीतर जागृत रहती हैं और स्वतः ही हमसे पाप कर्म होते रहते हैं । पर जब भक्ति से प्रभु हमारे जीवन में आ जाते हैं तो हमारी बुद्धि प्रभु के प्रभाव के कारण स्वतः ही गलत कर्म करने से मना कर देती है । प्रभु को जीवन के मध्य में रखकर किया हर कर्म पुण्यकर्म ही होता है । प्रभु के जीवन में आते ही हमारी बुद्धि सात्विक हो जाती है और पाप करने की प्रवृत्ति खत्म हो जाती है । प्रभु अगर जीवन में नहीं हैं तो हमारी बुद्धि गलत कर्म करने के लिए हमें उत्तेजित करती है और गलत कर्म करने का मार्ग भी हमें बतलाती है । पर जब प्रभु हमारे जीवन में होते हैं तो हमारी वही बुद्धि हमें गलत कर्म करने से रोक देती है और सत्कर्म करने की प्रेरणा देती है । बुद्धि वही है पर जीवन में प्रभु के होने और जीवन में प्रभु के न होने पर इतना बड़ा फर्क पड़ जाता है । प्रभु के जीवन में होने पर बुद्धि सात्विक रहती है और जीवन में प्रभु के न होने पर वही बुद्धि अपनी सात्विकता खो देती है ।
इसलिए जीवन में सदैव प्रभु के सानिध्य में रहने का प्रयास करना चाहिए । ऐसा भक्ति से ही संभव है । इसलिए हमें प्रभु की भक्ति करनी चाहिए जिससे प्रभु का सानिध्य हमें मिल सके ।
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