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Article |
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सच्चा गुरु कौन ? (जो प्रभु से हमें जोड़े वही सच्चा गुरु है)
परम गुरु, जगद्गुरु और आदिगुरु तो प्रभु ही हैं । पर सच्चा सांसारिक गुरु वही है जो अपने शिष्य को सिर्फ और सिर्फ प्रभु से जोड़ने में विश्वास रखता है । सच्चा गुरु प्रभु को ही माला पहनाता है और अपने शिष्यों से भी ऐसा ही करवाता है और खुद अपने शिष्यों से माला नहीं पहनता । सच्चा गुरु सदैव प्रभु की बातें करता है और सदा प्रभु से मिलन के लिए भक्ति का मार्ग ही बताता है । जो खुद का गुरु रूप में प्रभु के बराबर महत्व बताए, खुद माला पहने, खुद अपनी चरण पूजा करवाए, खुद अपनी जय-जयकार करवाए, वह सच्चा गुरु नहीं हो सकता । सच्चे गुरु की पहचान यही है कि वह खुद को पीछे रखकर प्रभु को आगे कर देता है । सच्चा गुरु अपने शिष्यों में प्रभु के लिए भक्ति जगाता है, न कि स्वयं के लिए । जो प्रभु को आगे करके खुद पीछे हट जाए और हमें प्रभु से जोड़े उन्हें ही सच्चा गुरु मानना चाहिए ।
इसलिए जीवन में गुरु का चयन बहुत सोच-समझकर, जांच-पड़ताल करके और सचेत होकर करना चाहिए ।
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समय का सच्चा उपयोग क्या है ? (भक्ति करके प्रभु को समय अर्पण करना ही समय का सच्चा उपयोग है)
प्रभु ने नवजात बच्चे को पालने के लिए माँ को ममता प्रदान की है । जिस ममता के बल पर एक माँ अपने बच्चों को पालने में अपना तन, मन और धन लगा देती है । वैसे ही प्रभु ने कुछ बिरलों को अपनी भक्ति प्रदान की है जो सदैव प्रभु से निष्काम होकर संसार नहीं मांगकर, भक्ति ही मांगते हैं । भक्ति का बल मिलने पर ऐसे बिरले भक्त अपने जीवन का बहुत बड़ा भाग और अपना तन, मन और धन प्रभु की सेवा में लगाते हैं । वे भक्ति के कारण ऐसा करने का मन और सामर्थ्य बना पाते हैं और प्रभु कृपा से उसे क्रियान्वित भी कर पाते हैं । ऐसे बिरले भक्त प्रभु की कृपा से अपने जीवन को प्रभु की सेवा में न्यौछावर करने में सफल हो जाते हैं । इसलिए प्रभु से कभी संसार नहीं मांगना चाहिए और केवल भक्ति ही मांगनी चाहिए जैसा कि सभी भक्तों ने प्रभु से मांगा और पाया भी है । भक्ति मांगना अगर मोती है तो संसार मांगना कंकड़ है । हमें यह देखना है कि सागर की तह तक जाकर हम मोती लाते हैं या कंकड़ लाते हैं ।
इसलिए प्रभु से भक्ति मांगनी चाहिए और भक्ति करके अपने जीवन के समय का सदुपयोग करना चाहिए ।
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जीवन की बागडोर किसे सौंपें ? (जीवन की बागडोर प्रभु को सौंपें)
हम हवाई जहाज में यात्रा करते हैं तो प्राणों की बागडोर हवाई जहाज के पायलट को सौंप देते हैं । हम समुद्री जहाज में यात्रा करते हैं तो अपने प्राणों की बागडोर जहाज के कप्तान को सौंप देते हैं । ऐसा करने में हम तनिक भी नहीं सोचते । पर प्रभु की शरणागति लेकर अपने जीवन की बागडोर हम प्रभु को नहीं सौंपते । यह कितना बड़ा हमारा दुर्भाग्य होता है । ऐसा नहीं कर पाने के कारण हम जीवन की कशमकश में फंसे रहते हैं और अशांत रहते हैं । प्रभु की शरणागति लेकर जो भाग्यवान अपने जीवन की बागडोर प्रभु के श्रीहाथों में सौंप देता है वह निश्चिंत हो जाता है । वह प्रभु की छत्रछाया में आ जाता है और प्रभु से अभयदान प्राप्त कर लेता है । फिर उसे संसार का कोई भी डर सता नहीं सकता । जीवन में प्रभु की शरणागति लेकर प्रभु को अपनी बागडोर सौंपना जीवन का एक बहुत बड़ा और उपयुक्त निर्णय होता है जिससे अनंत लाभ मिलता है ।
इसलिए जीवन में सदैव निश्चिंत रहना है तो प्रभु की शरणागति लेकर अपने जीवन की बागडोर अविलंब प्रभु को सौंप देनी चाहिए ।
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किससे हमारा सनातन संबंध है ? (प्रभु से हमारा सनातन संबंध है)
हम दुनियादारी करते हैं और दुनिया से अपना संपर्क बढ़ाते हैं पर प्रभु से अपना संपर्क नहीं बढ़ाते । हम दुनियावालों से प्रेम बढ़ाते हैं पर प्रभु से प्रेम नहीं बढ़ाते । यही चूक हम कर जाते हैं । दुनियावालों से हमारा संबंध धूल के दो कणों के समान है एवं जब हवा चलती है तो वे कण अलग-अलग हो जाते हैं । दुनियावालों से हमारा संबंध नदी में बहने वाले कागज के दो टुकड़ों के समान है जो एक लहर आने पर अलग-अलग हो जाते हैं । केवल प्रभु से ही हमारा संबंध जन्मों-जन्मों का है एवं सनातन है । संसार के हर प्राणी के साथ हमारा संबंध नश्वर है । हम नश्वर संबंध को जोड़े रखने के लिए कितना परिश्रम करते हैं पर सनातन संबंध, जो परमपिता परमेश्वर के साथ है, उस तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता । उस सनातन संबंध को मजबूत करने का हम प्रयत्न ही नहीं करते । यह हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य होता है ।
इसलिए जीवन में प्रभु के साथ जो हमारा सनातन संबंध है उसे सुदृढ़ करने का प्रयास करना चाहिए । भक्ति से ऐसा संभव है इसलिए प्रभु की भक्ति करके हमें ऐसा करना चाहिए ।
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दुनियादारी से क्या नहीं मिलता है ? (दुनियादारी से कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता)
हमें अपने जीवन का समय प्रभु की भक्ति के लिए निकालना चाहिए पर हम दुनियादारी में अपने जीवन का बहुत बड़ा समय व्यर्थ कर देते हैं । हमने कितनी भी दुनियादारी की तो भी हमारा संबंध दुनियावालों के साथ केवल इसी जन्म का है पर प्रभु के साथ हमारा सनातन संबंध है । हम कितनी बड़ी मूर्खता करते हैं कि एक जन्म के रिश्ते को इतना समय देते हैं और सनातन संबंध, जो प्रभु के साथ है, उसे समय नहीं देते । कितनी भी दुनियादारी कर ली, सबकी शादी में गए, जन्मोत्सव में गए, मकान या फैक्ट्री के मुहूर्त पर गए, बीमारी में गए, मृत्यु में गए, उत्सव में गए तो हमारे यहाँ भी खूब लोग आएंगे । जो अपना पूरा जीवन दुनियादारी करके गुजार देते हैं उनकी मृत्यु पर दस हजार लोग इकट्ठे हो जाते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं । पर यह भीड़ श्मशान तक ही होती है और प्रशंसा कुछ महीने या सालभर के लिए होती है । तीन-चार पीढ़ी बाद तो हमारे परिवार वाले भी हमें पूरी तरह से भूल चुके होते हैं ।
इसलिए जीवन में आध्यात्मिक लाभ लेने के लिए प्रभु की भक्ति करनी चाहिए क्योंकि प्रभु से ही हमारा सनातन संबंध है और प्रभु की भक्ति ही हमारा उद्धार करती है ।
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हमारा प्रयास किस दिशा में होना चाहिए ? (हमारा प्रयास प्रभु के लिए होना चाहिए)
दुनियादारी भरपूर रूप से करके हम अपनी मृत्यु पर भीड़ इकट्ठी कर सकते हैं और सांसारिक प्रशंसा पा सकते हैं पर हमारा कल्याण, उद्धार और मुक्ति उससे संभव नहीं है । ऐसा इसलिए क्योंकि हमने कल्याण, उद्धार और मुक्ति की दिशा में प्रयास ही नहीं किया और दुनियादारी के कारण ऐसा प्रयास करने के लिए हमारे पास समय ही नहीं बचा । दूसरी तरफ जो भक्त होते हैं उन्हें दुनियादारी से कोई लेना-देना नहीं होता और वे अपना सनातन संबंध प्रभु से ही मानते हैं और उसे ही मजबूती प्रदान करने के लिए श्रम करते हैं । प्रभु की निष्काम भक्ति करके वे मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि पा लेते हैं । उनकी मृत्यु पर चाहे चार लोग ही आएं पर ऐसे भक्त मृत्यु के बाद प्रभु के श्रीकमलचरणों में स्थान पा जाते हैं, जहाँ से फिर चौरासी लाख योनियों में जन्म लेकर कभी वापस नहीं आना पड़ता ।
इसलिए जीवन में दुनियादारी के लिए हमारा प्रयास नहीं होना चाहिए अपितु प्रभु की भक्ति के लिए ही हमारा प्रयास होना चाहिए ।
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काल किसे दंड देता है ? (प्रभु की भक्ति नहीं करने वाले को काल दंड देता है)
कोई जीव मनुष्य जन्म पाकर भी प्रभु की भक्ति नहीं करता और अपने जीवनकाल में प्रभु प्राप्ति नहीं कर पाता तो भी प्रभु इतने करुणावान हैं कि उसे दंड नहीं देते । पर काल उस जीव को दंड देता है और उस जीव को फिर चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ता है । चौरासी लाख योनियों में भ्रमण अपने आप में एक बहुत बड़ा दंड होता है । हम इस जीवन में प्रभु की भक्ति करके सदैव के लिए पृथ्वी पर आवागमन से मुक्त हो सकते हैं पर भक्ति नहीं करने के कारण हमें फिर से चौरासी लाख योनियों में भटकना पड़ता है । शास्त्र और संत इसे ही बहुत बड़ा दंड मानते हैं । हमें बस इतनी बात समझनी चाहिए कि हमारे इस जन्म को हमें अपना अंतिम जन्म बनाना है यानी इस जन्म के बाद हमें प्रभु के श्रीकमलचरणों में पहुँचना है । अगर हम यह संकल्प कर लेते हैं और ऐसा करने के लिए भक्ति करने लगते हैं तो फिर हम काल के दंड से बच जाते हैं ।
इसलिए जीवन में अगर चौरासी लाख योनियों में भटकने से बचना है और अपना मनुष्य जीवन सफल करना है तो प्रभु की भक्ति ही इसका एकमात्र विकल्प है । भक्ति के बिना काल के दंड से हमें कोई नहीं बचा सकता ।
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हमारा सर्वप्रथम रिश्ता किससे है ? (हमारा सर्वप्रथम रिश्ता प्रभु से है)
हम सबसे पहले परमपिता परमेश्वर की संतान हैं । हमारा सर्वप्रथम और एकमात्र स्थाई रिश्ता और पहचान प्रभु से है । संसार के रिश्ते नश्वर हैं और एक जन्म के बाद समाप्त हो जाने वाले हैं । प्रभु से हमारा रिश्ता सनातन है यानी हर जन्म एवं हर योनि में रहने वाला है । हमारा दुर्भाग्य है कि हम एक जन्म रहने वाले रिश्ते को तो मजबूती प्रदान करने की मेहनत करते हैं पर प्रभु से जो हमारा सनातन रिश्ता है, उसे मजबूती प्रदान करने से चूक जाते हैं । संसार का रिश्ता अंतिम-से-अंतिम श्मशान तक हमें छोड़ आएगा पर अगर हम भक्ति करके प्रभु से रिश्ता जोड़ते हैं तो वह हमें मृत्यु बाद भी प्रभु के श्रीकमलचरणों में पहुँचा देगा । संसार से संबंध को सुदृढ़ करने से हम कितना परिश्रम करते हैं फिर भी सभी को, सभी समय राजी नहीं रख पाते । दूसरी तरफ उसका एक तिहाई परिश्रम प्रभु से रिश्ता मजबूत करने में करें तो हम प्रभु को राजी कर लेंगे और तत्काल हमारा मानव जीवन सफल हो जाएगा ।
इसलिए जीवन में सर्वप्रथम और एकमात्र स्थाई रिश्ता प्रभु से रखना चाहिए और उसे मजबूती प्रदान करने के लिए प्रभु की भक्ति करनी चाहिए ।
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भक्त का परिवार कैसा होता है ? (भक्त का परिवार भी भक्तों का ही होता है)
भक्त प्रभु से जुड़ा हुआ होता है । वह संसार में किसी माता-पिता और परिवार में जन्म जरूर लेता है पर उसका उस परिवार से एक औपचारिक संबंध ही होता है । वह उसे शरीर का नाता मानता है पर मन का नाता भक्त उसी से मानता है जो भक्ति करता है । इस जगत में जो भी जीव परमपिता परमेश्वर से रिश्ता जोड़े हुए हैं वही उस भक्त का परिवार होता है । हर भक्त उसका पारिवारिक सदस्य होता है । उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरा भक्त किस जाति, देश और रंग का है । अगर प्रभु से उसने रिश्ता जोड़कर रखा है तो वह उसे अपने परिवार का ही मानता है । एक भक्त दूसरे भक्त से मिलकर ही सबसे ज्यादा प्रसन्न और आनंदित होता है । उनके बीच बातचीत एवं संवाद का विषय प्रभु होते हैं । भक्त बड़े गर्व से कहता है कि जैसे वह प्रभु से जुड़ा हुआ है वैसे ही दूसरा कोई भी जो प्रभु से जुड़ा हुआ है, वही उसका परिवार है ।
इसलिए भक्त का परिवार बहुत बड़ा होता है और देश की सीमा भी उसे बांधकर नहीं रख पाती । जाति, रंग और भूगोल से ऊपर उठकर उसका एक बहुत बड़ा परिवार होता है ।
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माया कब प्रभाव नहीं डालती ? (प्रभु के सानिध्य में रहने पर माया प्रभाव नहीं डालती)
प्रभु के आसपास माया का प्रभाव शून्य होता है । यह एक बहुमूल्य सूत्र है कि अगर हम प्रभु के आसपास रहते हैं तो निश्चित माया से बच जाएंगे क्योंकि माया प्रभु के आसपास के प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकती और न ही कभी करती है । इसलिए सदैव प्रभु के सानिध्य में रहना
चाहिए जिससे माया के प्रभाव से बचा जा सके । माया से बचना इसलिए जरूरी है क्योंकि माया हमारे मानव जीवन के उद्देश्य को असफल कर देती है । काम, क्रोध, मद, लोभ से कोई पुण्यात्मा संयम रखकर बच भी जाए पर माया से हमें संयम भी नहीं बचा पाता । माया से हम सिर्फ प्रभु की कृपा और अनुग्रह से ही बच सकते हैं । माया से जीव अपने प्रयासों से कदापि नहीं बच सकता । माया इतनी बलवती है और उसका वेग इतना ज्यादा है कि वह हम सबको बहा ले जाती है ।
इसलिए जीवन में भक्ति करके प्रभु के सानिध्य में रहना चाहिए जिससे कि माया हमारे जीवन में निष्क्रिय हो जाए यानी अपना प्रभाव नहीं डाल पाए ।
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