लेख सार : मांगना मनुष्य का स्वभाव है और वह प्रभु से भी मांगता है । पर जो आध्यात्मिक दृष्टि से जागृत हो जाते हैं वे प्रभु से संसार नहीं मांगकर प्रभु को मांगते हैं जो कि सबसे ऊँची मांग है । पूरा लेख नीचे पढ़ें -
हम प्रभु से प्रभु को मांग सकते हैं और हमें मानव जन्म लेकर आने के बाद ऐसा ही करना चाहिए । भक्ति हमें ऐसा ही करना सिखाती है कि प्रभु से प्रभु को ही मांगा जाए । यह जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है । इससे बड़ा मानव जीवन पाकर हासिल करने योग्य कुछ भी नहीं है ।
पर हमारी मूर्खता देखें कि हम प्रभु से धन, संपत्ति, गाड़ी, बंगला, पुत्र, पौत्र मांगते हैं । हमारी मांग संसारी होती है और उसकी सूची बड़ी लंबी होती है । प्रभु को लगता है कि यह मुझे छोड़कर सब कुछ मांगता है इसलिए प्रभु सहर्ष दे भी देते हैं । पर यह मांग तो वैसी ही है जैसे हमने मोती लाने के लिए समुद्रदेवजी में गोता लगाया और कंकड़ लेकर लौटे ।
संसाररूपी कंकड़ पाकर भी हम सुखी हो जाते हैं कि हमने अपने मानव जीवन को सार्थक कर लिया । हमारे पास धन है, संपत्ति है, गाड़ियों की कतार है, फैक्ट्री या बड़ा व्यवसाय है, पुत्र हैं और पौत्र हैं और इन सबके होने पर हम पूर्णता का अनुभव करते हैं । पर शास्त्र और संत कहते हैं कि ऐसा सब कुछ पाकर भी हमने अपना मानव जीवन विफल कर लिया अगर उसमें हमने प्रभु की प्राप्ति नहीं की ।
मानव जीवन हमें मिला ही प्रभु प्राप्ति के लिए है । सभी श्रीग्रंथों में यह बात स्पष्ट रूप से अंकित है । अगर हमने जीवन भर प्रयास करके प्रभु के अतिरिक्त अन्य सब कुछ पा भी लिया तो भी वह मृत्यु के बाद हमारे काम आने वाला नहीं है । मृत्यु की बात को छोड़ भी दें तो भी जीवन काल में भी अगर हम गंभीर रूप से बीमार पड़ गए तो हमारी धन, संपत्ति, गाड़ी, बंगला, पुत्र और पौत्र कोई काम आने वाला नहीं है क्योंकि कोई भी हमें एक अतिरिक्त श्वास तक नहीं दे सकता ।
इसलिए जीवन यापन जितनी धन की कमाई करने के बाद हमें भक्ति की कमाई करनी चाहिए जिससे प्रभु के श्रीकमलचरणों में हम अपना स्थान पा सकें । भक्ति ही संसार सागर का वह मोती है जिसे पाने के लिए हमें मानव रूप में जन्म मिला है ।
मानव तन पाकर भक्ति से कम हमने कुछ भी अर्जित किया तो वह लाभ का नहीं हानि का सौदा है । भक्ति हमारा इहलोक भी सुधारती है और परलोक को भी सुधारती है । भक्ति हमें प्रभु की करुणा और प्रभु का अनुग्रह प्राप्त करवा देती है । प्रभु का धन, संपत्ति, गाड़ी, बंगला, पुत्र, पौत्र देने को हम अनुग्रह मान लेते हैं पर यह प्रभु का बहुत साधारण अनुग्रह है । सच्चा और सबसे सर्वश्रेष्ठ अनुग्रह प्रभु तब करते हैं जब हमें अपना प्रेम देकर अपने श्रीकमलचरणों में सदैव के लिए स्थान दे देते हैं और संसार के आवागमन से मुक्ति दे देते हैं ।
इसलिए जीवन में प्रभु से संसार न मांगें, प्रभु से प्रभु की भक्ति, प्रभु का प्रेम मांगें और प्रभु का सानिध्य मांगें । भक्तों और संतों ने प्रभु से यही मांगा है और यही पाया भी है और इस तरह अपने मानव जीवन को सफल भी किया है ।